पूर्व-मुस्लिम महिला सफ़िया पीएम की कानूनी लड़ाई: धर्मनिरपेक्ष संपत्ति अधिकारों की मांग
केरल की 51 वर्षीय सफ़िया पीएम उन महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं, जो धर्म छोड़ने के बाद भी शरिया कानून की जकड़न से मुक्त होना चाहती हैं। वह मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मिलने वाले भेदभावपूर्ण संपत्ति अधिकारों को चुनौती देते हुए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के तहत समान अधिकारों की मांग कर रही हैं। उनकी इस लड़ाई को सर्वोच्च न्यायालय ने संज्ञान में लिया है और केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।
सफ़िया का सफर: निजी संघर्ष से कानूनी लड़ाई तक
सफ़िया पीएम केरल के अलप्पुझा जिले की निवासी हैं और ‘केरल के पूर्व-मुस्लिम’ संगठन की महासचिव हैं। साल 2004 में तलाक के बाद उन्होंने अपनी बेटी (अब 25 वर्ष की) की अकेले परवरिश की। लेकिन जब उन्होंने पारिवारिक संपत्ति में अपने अधिकारों की मांग की, तो उन्हें अहसास हुआ कि मुस्लिम पर्सनल लॉ महिलाओं के साथ भेदभाव करता है।
उनके पिता यू. ए. मुहम्मद (71), जो स्वयं कम्युनिस्ट और नास्तिक हैं, अपनी संपत्ति को बेटी और ऑटिज़्म से पीड़ित बेटे के बीच बराबर बांटना चाहते थे। लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार, एक महिला को पुरुष वारिसों की तुलना में आधे से भी कम संपत्ति मिलती है।
सफ़िया कहती हैं, “अगर मैंने इस्लाम छोड़ दिया, तो शरिया कानून मुझ पर क्यों लागू हो? यह संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन है।”
कानूनी पहल: भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम लागू करने की मांग
सफ़िया पीएम ने सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर मांग की है कि जो व्यक्ति धर्म छोड़ चुके हैं, उन पर मुस्लिम पर्सनल लॉ नहीं, बल्कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 लागू होना चाहिए।
उनकी याचिका के मुख्य बिंदु:
- अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (धर्म के आधार पर भेदभाव निषेध) के तहत शरिया कानून असंवैधानिक है।
- धर्म त्यागने के बाद भी किसी व्यक्ति पर धार्मिक कानून लागू नहीं होना चाहिए।
- भारत में सभी नागरिकों को समान संपत्ति अधिकार मिलने चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने 28 जनवरी को इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
शरिया कानून और महिलाओं के अधिकारों पर बहस
मुस्लिम पर्सनल लॉ में महिलाओं को पुरुषों के बराबर संपत्ति अधिकार नहीं दिए जाते। इसके अनुसार:
✅ अगर परिवार में अन्य पुरुष वारिस (जैसे भाई) हों, तो महिला को सिर्फ 1/3 संपत्ति मिलती है।
✅ अगर महिला एकमात्र उत्तराधिकारी हो, तब भी उसे सिर्फ 50% संपत्ति मिलती है।
✅ अगर कोई व्यक्ति इस्लाम छोड़ देता है, तो उसे परिवार की संपत्ति से पूरी तरह वंचित कर दिया जाता है।
सफ़िया इस कानून को अनुचित बताते हुए कहती हैं, “हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन फिर भी धार्मिक कानूनों की वजह से महिलाओं के अधिकारों का हनन हो रहा है।”
यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) पर बहस
सफ़िया पीएम यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) का समर्थन करती हैं, जिससे सभी धर्मों के लोगों पर एक समान नागरिक कानून लागू होगा।
लेकिन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ इस्लामिक संगठनों का कहना है कि UCC इस्लामिक सिद्धांतों में हस्तक्षेप करता है।
सफ़िया जवाब देती हैं, “यह धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि न्याय के पक्ष में लड़ाई है। अगर किसी धर्म में महिलाओं को आधे अधिकार ही दिए जाते हैं, तो उसे बदलना ही होगा।”
पूर्व-मुस्लिमों की चुनौतियाँ: सामाजिक बहिष्कार और पहचान का संकट
सफ़िया ‘केरल के पूर्व-मुस्लिम’ संगठन से जुड़ी हैं, जिसकी स्थापना 2019 में हुई थी। यह संगठन उन लोगों की मदद करता है, जो इस्लाम छोड़ने के बाद सामाजिक बहिष्कार और पहचान के संकट का सामना करते हैं।
संगठन का कहना है कि धर्म छोड़ने वाले लोगों को न केवल मुस्लिम समुदाय से, बल्कि हिंदू बहुल समाज से भी संदेह झेलना पड़ता है।
सफ़िया कहती हैं, “हमें दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ती है—अपने अधिकारों के लिए और समाज में स्वीकार्यता के लिए।”
समर्थन और विरोध: क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?
✅ नास्तिक और महिला अधिकार संगठन सफ़िया के समर्थन में खड़े हैं और इसे महिलाओं के समान अधिकारों की लड़ाई मानते हैं।
❌ मुस्लिम संगठन इस मामले को धर्म पर हमला मानते हैं और UCC के खिलाफ हैं।
✅ कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भारत में व्यक्तिगत कानूनों की समीक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।
निष्कर्ष: क्या होगा इस कानूनी लड़ाई का भविष्य?
सफ़िया पीएम का मामला सिर्फ व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में धर्मनिरपेक्षता और लैंगिक समानता की व्यापक बहस का हिस्सा बन चुका है।
अगर सर्वोच्च न्यायालय सफ़िया के पक्ष में फैसला देता है, तो यह उन लाखों महिलाओं के लिए मिसाल बनेगा, जो धार्मिक कानूनों के कारण अपने अधिकारों से वंचित हैं।
सफ़िया का संदेश स्पष्ट है:
“संविधान हमारा सबसे बड़ा धर्म है, और न्याय हमें संविधान के आधार पर ही मिलना चाहिए।”
क्या होगा आगे?
➡️ केंद्र सरकार का जवाब आने के बाद इस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय की अगली सुनवाई होगी।
➡️ यदि सफ़िया की याचिका स्वीकार की जाती है, तो यह मुस्लिम पर्सनल लॉ में बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है।
➡️ यह मामला यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) की बहस को भी और तेज कर सकता है।
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